मानव जिस ओर गया नगर बसे तीर्थ बने तुमसे है कौन बड़ा गगन सिन्धु मित्र बने भूमा का भोगो सुख, नदियों का सोम पियो त्यागो सब जीर्ण बसंत नूतन के संग-संग चलते चलो ।

निम्नलिखित पद्यांश की व्याख्या संदर्भ प्रसंग सहित कीजिए:

मानव जिस ओर गया 
नगर बसे तीर्थ बने 
तुमसे है कौन बड़ा 
गगन सिन्धु मित्र बने 
भूमा का भोगो सुख, नदियों का सोम पियो 
त्यागो सब जीर्ण बसंत नूतन के संग-संग चलते चलो ।

संदर्भ - यह पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक नवनीत के चरैवेति-जन- गरबा से ली गई इसके कवि नरेश मेहता जी है 

प्रसंग - कवि ने पुरानी परम्पराओं को छोड़कर नवीनता की और आगे बढ़ने की सलाह दी है ।

व्याख्या - मानव कर्म करते हुए, जिस ओर गया वहाँ उसने निर्माण किया। नगर बसे, तीर्थ स्थान बने। नए- नए अविष्कार और खोज की।

हे गति शीलमानव तुमसे बड़ा कोई नही है। भूलोक, आकाशलोक, पाताल लोक, तुम्हारे प्रिय हो गए। 

हे मानव! तुम नदियो का जल रूपी अमृत पियो और पृथ्वी के सभी आनन्दे का उपयोग करो । तुम पुरानी परम्पराओ को छोड़कर नवीनता की और आगे बढ़ते जाओ ।

विशेष - 

इस पद्यांश में कवि ने मानव की विजय गाथा पर प्रकाश डाला है।

कवि कहते हैं कि जहां भी मानव गया, वहां नगर और तीर्थस्थल बन गए। यानी मानव ने अपनी सामर्थ्य और परिश्रम से पृथ्वी पर अपना अधिकार जमा लिया।

फिर कवि पूछते हैं कि मानव से बड़ा कौन है? आकाश और समुद्र भी मानव के मित्र बन गए हैं। यानी मानव ने अपनी बुद्धि और प्रयासों से प्रकृति को भी जीत लिया है।

आगे कवि मानव से कहते हैं कि अब पुरानी परंपराओं और विचारधाराओं को त्यागकर नए विचारों के साथ आगे बढ़ो।

अर्थात् मानव ने अब तक बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन अभी भी नए क्षितिज खोलने हैं। उन्हें नवीन विचारधारा को ग्रहण करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

इस प्रकार इस पद्यांश में कवि ने मानव की विजय गाथा को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। 

इस पद्यांश को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:

  • पंक्तियाँ 1-2: जहां जहां मानव गया, वहां वहां नगर और तीर्थस्थल बस गए। अर्थात् मानव ने अपनी सामर्थ्य से पृथ्वी पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
  • पंक्ति 3: मानव से बड़ा कौन है? अर्थात् मानव सर्वोपरि है।
  • पंक्ति 4: आकाश और समुद्र भी मानव के मित्र बन गए हैं। अर्थात् मानव ने प्रकृति पर भी विजय प्राप्त कर ली है।
  • पंक्ति 5: पृथ्वी का आनंद लो, नदियों का जल पीकर सुख प्राप्त करो। अर्थात् मानव अब पृथ्वी का स्वामी है और उसका भोग कर सकता है।
  • पंक्ति 6: पुरानी परंपराओं और विचारधाराओं को त्यागकर नए विचारों के साथ आगे बढ़ो।

अतः सारांश यह है कि मानव ने अब तक बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं लेकिन अभी और नए क्षितिज खोलने की आवश्यकता है। इसके लिए नवीन विचारधारा को अपनाना होगा। 

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